उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में ध्वनि उद्योग तकनीकी सीमाओं से जूझ रहा था, क्योंकि रिकॉर्ड की प्रतियां बड़े पैमाने पर तैयार करना संभव नहीं था।
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- अठारह सौ अठासी में थॉमस अल्वा एडिसन ने उन्नत ध्वनि यंत्र प्रस्तुत किया, जिसमें टिन फॉइल के स्थान पर मोम बेलन का उपयोग किया गया और ध्वनि की स्पष्टता बढ़ी।
- सार्वजनिक स्थलों और घरों में लोकप्रियता बढ़ने के बावजूद प्रारंभिक रिकॉर्डिंग की व्यावसायिक प्रतिलिपि बनाना कठिन था।
- यदि किसी रिकॉर्ड की अनेक प्रतियां चाहिए होती थीं तो कलाकार को वही प्रस्तुति बार-बार दोहरानी पड़ती थी, जिससे प्रक्रिया श्रमसाध्य हो जाती थी।
- कुछ कंपनियों ने एक ही समय में कई ध्वनि यंत्रों के सामने कलाकार से प्रस्तुति दिलवाकर प्रतियां तैयार करने का प्रयास किया, जिससे गुणवत्ता प्रभावित होती थी।
- अठारह सौ छियानवे में एल्ड्रिज जॉनसन द्वारा विकसित डिस्क आधारित यंत्र ने एक मूल रिकॉर्ड से कई प्रतियां बनाने की सुविधा प्रदान की।
- प्रारंभिक तकनीकी सीमाओं और सीमित आर्थिक लाभ के कारण कई प्रसिद्ध कलाकार रिकॉर्डिंग कराने से हिचकते थे।
- कम प्रसिद्ध कलाकारों ने रिकॉर्डिंग को अवसर के रूप में अपनाया और उनकी ध्वनियां आज लोकप्रिय संगीत संस्कृति का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
- उन्नीस सौ दो के बाद उन्नत मोम बेलन तकनीक से प्रतिलिपि प्रक्रिया बेहतर हुई, किंतु शीघ्र ही डिस्क प्रणाली ने संगीत उद्योग को व्यापक उत्पादन की दिशा में अग्रसर कर दिया।





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