भारत में न्यायपालिका संविधान की रक्षा और संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिरेक तीन ऐसे सिद्धांत हैं जो न्यायपालिका की सीमाएँ और शक्तियाँ तय करते हैं।
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- न्यायिक समीक्षा से अदालतें कानूनों की संवैधानिकता जांच सकती हैं।
- इसका अधिकार संविधान के अनुच्छेद 13 से प्राप्त होता है।
- अनुच्छेद 13 संसद और राज्य विधानमंडलों को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने से रोकता है।
- जो कानून मौलिक अधिकारों का हनन करे, वह शून्य माना जाता है।
- उदाहरण: सुप्रीम कोर्ट ने IT अधिनियम की धारा 66A को निरस्त किया।
- न्यायिक सक्रियता में अदालतें सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
- इसमें सुओ मोटो कार्यवाही और लोकहित याचिका (PIL) जैसे उपकरण शामिल हैं।
- उदाहरण: केशवानंद भारती मामला (1973) — ‘मूल संरचना सिद्धांत’ की स्थापना।
- न्यायिक अतिरेक तब होता है जब अदालतें कार्यपालिका या विधायिका के क्षेत्र में दखल देती हैं।
- उदाहरण: NJAC अधिनियम को रद्द करना या नौकरशाहों को सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजने का आदेश देना।





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