भारत की क्षेत्रीय परिषदें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच समन्वय बढ़ाकर सहकारी संघवाद को मजबूत करती हैं तथा संतुलित सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देती हैं।
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- ये परिषदें विचार विमर्श आधारित निकाय हैं और इनके सुझाव बाध्यकारी नहीं होते, लेकिन संवाद और सहमति के माध्यम से अंतर राज्यीय विवादों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- भारत में पांच क्षेत्रीय परिषदें हैं, जिनमें उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्र शामिल हैं, जो विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कवर करती हैं।
- केंद्रीय गृह मंत्री सभी क्षेत्रीय परिषदों के अध्यक्ष होते हैं, जबकि सदस्य राज्यों के मुख्यमंत्री एक वर्ष के लिए बारी बारी से उपाध्यक्ष का कार्य करते हैं।
- परिषदों में बुनियादी ढांचा विकास, जल बंटवारा, भूमि विवाद, वित्तीय सहायता और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी योजनाओं पर व्यापक चर्चा की जाती है।
- ये परिषदें राष्ट्रीय मुद्दों जैसे विद्यालय छोड़ने की समस्या, कुपोषण, बैंकिंग सुविधा विस्तार और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने जैसे विषयों पर भी विचार करती हैं।
- परिषदों के सदस्य राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासक और अन्य नामित मंत्री होते हैं, जबकि सलाहकार के रूप में विभिन्न प्रशासनिक अधिकारी शामिल होते हैं।
- उत्तर पूर्वी परिषद 1971 में स्थापित एक विशेष निकाय है, जो उत्तर पूर्वी क्षेत्र के विकास, सुरक्षा और समन्वित योजना निर्माण पर विशेष ध्यान देती है।





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