भारत में चुनावों से पहले भाषा पर विवाद तेज हो रहे हैं। नेता हिंदी या स्थानीय भाषाओं के नाम पर राजनीति कर रहे हैं। लेकिन आम जनता, खासकर युवा, भाषा नहीं बल्कि नौकरी को प्राथमिकता दे रहे हैं। विडंबना यह है कि जो नेता अंग्रेजी या हिंदी का विरोध करते हैं, वे खुद अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम या विदेश पढ़ने भेजते हैं।
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- चुनाव से पहले फिर शुरू हुई भाषा राजनीति; हिंदी बनाम क्षेत्रीय भाषाएँ
- अमित शाह ने अंग्रेजी की आलोचना की, पर खुद अंग्रेजी संस्थानों में पढ़े
- शाह का मानना: अंग्रेजी गुलामी की भाषा, हिंदी अपनाएं
- ठाकरे परिवार हिंदी का विरोध करते, पर बच्चों को भेजा अंग्रेजी स्कूल
- स्टालिन बोले: NEP से तमिल पर हिंदी थोपने की कोशिश
- DMK नेताओं के बच्चे पढ़ते विदेशों में, हिंदी विरोध सिर्फ चुनावी मुद्दा
- जनता अंग्रेजी, हिंदी सीखना चाहती रोजगार के लिए, झगड़े नहीं
- निजी स्कूलों में हिंदी शामिल जनता की माँग से, न कि दबाव से
- फिल्म, क्रिकेट ने तोड़ा उत्तर-दक्षिण भाषा भेद; हिंदी बन रही लोकप्रिय
- युवाओं को चाहिए नौकरी, न भाषा विवादों की राजनीति





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