बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में कांग्रेस में उग्र नेताओं का उदय हुआ, जिन्होंने नरम नीतियों को नकारते हुए स्वराज के लिए जन आंदोलनों और कड़े विरोध का मार्ग अपनाया।
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- उग्र चरण का उदय बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में हुआ, जब युवा नेताओं ने नरम नीतियों से असंतोष जताकर अधिक प्रभावी और प्रत्यक्ष राजनीतिक कार्रवाई की मांग की।
- 1905 में बंगाल विभाजन ने राष्ट्रीय भावना को तेज किया और पूरे देश में उग्र विचारधारा के प्रसार को गति प्रदान की।
- उग्र नेताओं ने स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और आत्मनिर्भरता जैसे उपायों के माध्यम से औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी।
- बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल और अरविंद घोष जैसे नेताओं ने जन आंदोलनों का नेतृत्व कर राष्ट्रवादी भावना को मजबूत किया।
- सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भारतीय संस्कृति के प्रति गर्व बढ़ाया और राजनीतिक जागरूकता को मजबूत आधार प्रदान किया।
- आर्थिक संकट, अकाल और प्रशासनिक विफलताओं ने जनता में असंतोष बढ़ाया, जिससे कठोर विरोध और संघर्ष की भावना को बल मिला।
- नरम और उग्र विचारधारा के टकराव के कारण 1907 में सूरत अधिवेशन में विभाजन हुआ, जिससे संगठन को अस्थायी कमजोरी का सामना करना पड़ा।
- चुनौतियों के बावजूद यह चरण जन जागरण को बढ़ाने और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए मजबूत आधार तैयार करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।





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