ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में सिविल सेवाओं का विकास औपनिवेशिक नियंत्रण, राजस्व संग्रह और प्रशासनिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए किया गया। अठारहवीं सदी के अंत से लागू सुधारों ने एक केंद्रीकृत और कठोर व्यवस्था बनाई, जिसमें भारतीयों को लंबे समय तक बाहर रखा गया।
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लॉर्ड कॉर्नवालिस ने भ्रष्टाचार रोकने और नियंत्रण बढ़ाने के लिए सिविल सेवा की स्थापना की।
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सिविल सेवाओं का उद्देश्य ब्रिटिश आर्थिक हितों और राजनीतिक प्रभुत्व को मजबूत करना था।
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प्रारंभिक नियुक्तियाँ संरक्षकवाद पर आधारित थीं, बाद में प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली अपनाई गई।
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अधिकांश परीक्षाएँ इंग्लैंड में होने से भारतीयों की भागीदारी सीमित रही।
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चार्टर एक्ट और आयोगों ने सुधार सुझाए, पर भारतीयकरण को गंभीरता से नहीं अपनाया गया।
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सेवाओं को इम्पीरियल, प्रांतीय और अधीनस्थ वर्गों में विभाजित किया गया।
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भारतीय सिविल सेवा ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक रीढ़, यानी “स्टील फ्रेम”, बन गई।





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