“धन की निकासी” सिद्धांत बताता है कि ब्रिटिश शासनकाल में भारत की संपत्ति लगातार इंग्लैंड भेजी गई। दादाभाई नौरोजी ने इसे 1867 में उजागर किया और बताया कि इस लूट से भारत में गरीबी और ठहराव आया।
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- धन की निकासी = भारत की संपत्ति का इंग्लैंड को निरंतर स्थानांतरण
- 1867 में दादाभाई नौरोजी ने सबसे पहले उठाया मुद्दा
- उनकी किताब Poverty and Un-British Rule in India (1871) में विस्तार
- ब्रिटेन ने सस्ते कच्चे माल लिया, महंगे सामान बेचे
- भारतीय राजस्व से ब्रिटिश प्रशासन, सेना, पेंशन खर्च पूरे हुए
- निर्यात अधिशेष से भारत को कोई लाभ नहीं मिला
- भारतीय सैनिकों व कर्मचारियों को कम वेतन मिला
- भारत पर कर बोझ भारी, आय का 14.3% टैक्स, इंग्लैंड में 6.9%
- पब्लिक डेट ब्याज, प्रेषण, पेंशन ने संसाधन खींचे
- असर: उद्योग ठप, रोजगार घटा, 18वीं–19वीं सदी में ठहराव
- आर.सी. दत्त और एम.जी. रणाडे जैसे अर्थशास्त्रियों ने आगे बढ़ाया सिद्धांत
- आधुनिक संदर्भ में इसे “आर्थिक साम्राज्यवाद” या “पूंजी पलायन” कहा गया





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