भारत में विवाद निवारण तंत्र न्यायालयों के अतिरिक्त और सहायक संस्थागत व्यवस्थाएँ हैं, जिनका उद्देश्य शीघ्र न्याय सुनिश्चित करना और लंबित मामलों का बोझ कम करना है।
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भारत में विवाद निवारण तंत्र कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक विवादों के समाधान हेतु न्यायालयों के साथ-साथ वैकल्पिक मंच प्रदान करते हैं।
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सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत शीघ्र सुनवाई के अधिकार को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा माना है।
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प्राचीन भारत में पंचायत प्रणाली विवाद समाधान का प्रमुख माध्यम थी, जिसमें सामाजिक सहमति और सामुदायिक संतुलन को प्राथमिकता दी जाती थी।
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कल्याणकारी राज्य की बढ़ती भूमिका से शासन और नागरिकों के बीच विवादों में वृद्धि हुई, जिससे विशेष न्यायाधिकरणों की आवश्यकता बनी।
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अनुच्छेद 323A और 323B के तहत गठित प्रशासनिक न्यायाधिकरण सेवा, कर, श्रम और चुनाव संबंधी विवादों का समाधान करते हैं।
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राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण कंपनियों से जुड़े मामलों को एकीकृत कर तेज, प्रभावी और विशेषज्ञ समाधान प्रदान करता है।
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अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत विशेष न्यायाधिकरणों द्वारा सुलझाए जाते हैं।
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राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े मामलों में त्वरित एवं विशेषज्ञ आधारित न्याय उपलब्ध कराता है।





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