हिमाचल प्रदेश और हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन का खतरा जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के कारण बढ़ रहा है। यह चिंता IIT-मंडी में आयोजित लैंडस्लाइड रिस्क असेसमेंट एंड मिटिगेशन (LARAM) कोर्स 2026 के दौरान विशेषज्ञों ने जताई, जहाँ भारत और विदेशों के वैज्ञानिकों ने बदलते मौसम पैटर्न, मानवीय हस्तक्षेप और नई तकनीकों पर चर्चा की।
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- हिमालयी क्षेत्र, खासकर हिमाचल में भूस्खलन का खतरा बढ़ने की चेतावनी।
- IIT-मंडी में आयोजित LARAM कोर्स 2026 के दौरान विशेषज्ञों ने उठाई चिंता।
- जलवायु परिवर्तन से वर्षा के पैटर्न में बदलाव, ढलानों की स्थिरता कमजोर।
- कम समय में अत्यधिक तेज बारिश की घटनाएँ पहले से अधिक होने लगीं।
- अचानक भारी बारिश से मिट्टी जल्दी संतृप्त, भूस्खलन की संभावना बढ़ती।
- सड़कों, इमारतों और अन्य निर्माण के लिए पहाड़ी ढलानों की बड़े पैमाने पर कटाई।
- चार-लेन सड़कों के लिए 10–12 मीटर तक गहरी ढलान कटाई, जोखिम बढ़ा।
- इंफ्रास्ट्रक्चर का अतिरिक्त भार पहले से कमजोर भूभाग को और अस्थिर करता।
- जोखिम आकलन के लिए रिमोट सेंसिंग, ग्राउंड स्टडी और कंप्यूटेशनल मॉडल का उपयोग।
- AI और मशीन लर्निंग से पूर्वानुमान में सुधार, लेकिन सटीक भविष्यवाणी अभी भी चुनौती।
- विशेषज्ञों ने बेहतर नीतियाँ, हैजर्ड मैपिंग और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत बताई।





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