भारत में स्वच्छ ऊर्जा की मांग बढ़ने के साथ तांबे की भूमिका अहम बन रही है। लेकिन घरेलू पुनर्चक्रण प्रणाली असंगठित है और गुणवत्ता कमजोर। तकनीकी उन्नयन और नीतिगत सुधार से ही भारत इस मांग को पूरा कर सकता है।
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- 2050 तक तांबे की वैश्विक मांग में 50% वृद्धि का अनुमान।
- भारत 95–99% पुराने तांबे को पुनः उपयोग करता है, पर केवल 1% ही परिष्कृत रूप में।
- असंगठित पुनर्चक्रण से अशुद्ध तांबा मिलता है, जो ऊर्जा क्षेत्र के लिए अनुपयुक्त।
- 18% GST औपचारिक पुनर्चक्रण को हतोत्साहित करता है, इसे कम करने की ज़रूरत।
- दो तकनीकें मौजूद: LPE (लचीली पर ऊर्जा-खपत अधिक), Electrorefining (अधिक कुशल पर महंगी)।
- LPE ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उपयुक्त, यदि नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित हो।
- भारत में कोई राष्ट्रीय रजिस्ट्री नहीं, गुणवत्ता मानक लागू नहीं हो पाते।
- 2028 से लागू 5% पुनर्चक्रित सामग्री नियम वैश्विक औसत (35%) से बहुत कम।
- ई-वेस्ट के लिए PLI योजना प्रस्तावित, सफलता क्रियान्वयन पर निर्भर।
- नियमों को सख्त करना, R&D निवेश और स्क्रैप एकत्रीकरण को संस्थागत बनाना आवश्यक।





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