ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर भूमि कर प्रणालियों के माध्यम से भारी शोषण हुआ। स्थायी बंदोबस्त, रैयतवारी और महालवारी जैसी व्यवस्थाएं किसानों पर अत्यधिक बोझ डालने के लिए बनाई गई थीं। इनका मुख्य उद्देश्य राजस्व संग्रह था, न कि किसानों का कल्याण।
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- ब्रिटिशों ने भूमि कर से व्यापार, युद्ध और प्रशासन का खर्च निकाला
- मुख्य प्रणालियाँ: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवारी, महालवारी, तालुकेदारी, मालगुज़ारी
- स्थायी बंदोबस्त (1793) में ज़मींदार टैक्स लेते और हिस्सा रखते थे
- रैयतवारी (1820) में किसान को जमीन का मालिकाना हक; टैक्स सीधा सरकार को
- महालवारी (1822) में पूरा गाँव (महाल) टैक्स इकाई; मुखिया वसूलता था
- अधिक करों से किसान खाद्य फसलों से नकदी फसलों की ओर मुड़े
- खाद्य संकट, अकाल, और भूखमरी आम हो गए
- जमीन बिकाऊ, गिरवी और हस्तांतरणीय हुई; साहूकारों का बोलबाला
- किसानों पर कर्ज बढ़ा; कारीगर भी खेती की ओर मुड़े
- ग्रामीण असमानता, बंधुआ मज़दूरी, और शोषण को बढ़ावा मिला





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