ब्रिटिश आर्थिक नीतियों ने, विशेषकर सत्रह सौ सत्तावन के बाद बंगाल तथा अन्य नियंत्रित क्षेत्रों में, भारत को औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में बदल दिया। राजस्व की निकासी, स्थानीय उद्योगों की कमजोरी और संसाधनों का बाहरी हितों के लिए उपयोग इसका मुख्य कारण बना।
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- ब्रिटिश शासन ने भारत की अर्थव्यवस्था को भारत के विकास के बजाय अपने हितों के अनुसार ढाल दिया।
- प्लासी के युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल में राजनीतिक शक्ति के सहारे आर्थिक नियंत्रण बढ़ाया।
- भारतीय बुनकरों को कम दाम पर सामान बेचने को मजबूर किया गया, जिससे हस्तशिल्प और आय दोनों प्रभावित हुए।
- कंपनी ने प्रतिस्पर्धी व्यापारियों को हटाया और कच्चे कपास के व्यापार पर भी अपना अधिकार मजबूत किया।
- ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति ने भारतीय कच्चे माल की माँग बढ़ाई और भारत को तैयार माल के बड़े बाजार में बदला।
- धन निकासी की प्रक्रिया सत्रह सौ सत्तावन के बाद शुरू हुई और सत्रह सौ पैंसठ में दीवानी मिलने के बाद तेज हुई।
- भारतीय राजस्व से भारतीय वस्तुएँ खरीदी गईं और ब्रिटेन भेजी गईं, पर भारत को समान आर्थिक लाभ नहीं मिला।
- इसके लंबे प्रभावों में उद्योग ह्रास, ऋणग्रस्तता, निर्धनता, अकाल और व्यापक आर्थिक असंतुलन शामिल रहे।
- सड़क, रेल, नदी परिवहन, डाक और तार व्यवस्था का विस्तार मुख्यतः शासन, सेना और व्यापारिक लाभ के लिए किया गया।





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