1980 के दशक में असम ने अपनी सांस्कृतिक और भाषाई पहचान बचाने के लिए एक ऐतिहासिक संघर्ष किया, जिसका अंत 1985 के असम समझौते से हुआ। यह आंदोलन अवैध प्रवासियों के बढ़ते प्रभाव और असम की पहचान बचाने की लड़ाई का प्रतीक बना।
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- खारगेश्वर तालुकदार असम आंदोलन के पहले शहीद बने, उनकी शहादत आंदोलन का प्रतीक बनी।
- आंदोलन 1979 में शुरू हुआ, अवैध प्रवासियों के 1950 से जारी प्रवाह को रोकने की मांग की।
- तालुकदार की हत्या के बाद आंदोलन तेज हुआ, जिसके चलते 1979 में राष्ट्रपति शासन लगाया गया।
- आंदोलन में AASU और AAGSP ने नेतृत्व किया, अवैध प्रवासियों की पहचान, मताधिकार से वंचित करने और निर्वासन की मांग की।
- 1983 के विधानसभा चुनावों के दौरान हिंसा बढ़ी, नेल्ली नरसंहार में हजारों लोग मारे गए।
- 15 अगस्त 1985 को छह साल के संघर्ष के बाद असम समझौता हुआ, जिसमें मुख्य प्रावधान शामिल थे:
- 1 जनवरी 1966 से पहले आए प्रवासियों को रहने की अनुमति।
- 1966 से 24 मार्च 1971 के बीच आए प्रवासी 10 साल तक मताधिकार से वंचित।
- 24 मार्च 1971 के बाद आए प्रवासियों को निर्वासित किया जाएगा।
- असम की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान की रक्षा का वादा।
- NRC असम समझौते का हिस्सा है, लेकिन यह विवादों से घिरा हुआ है।
- तालुकदार और आंदोलन की विरासत असम की पहचान बचाने के प्रयासों को प्रेरित करती है।





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