आर्थिक राष्ट्रवाद — जिसमें आर्थिक नीतियाँ राष्ट्रीय हितों को वैश्विक निर्भरता से ऊपर रखती हैं — एक बार फिर उभर रहा है। यह संरक्षणवाद, सरकारी नियंत्रण और रणनीतिक व्यापार नीतियों का मिश्रण है।
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जड़ें 16वीं–18वीं सदी के व्यापारीवाद में, जहाँ व्यापार अधिशेष से संपत्ति बढ़ाने पर ज़ोर था।
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19वीं–20वीं सदी में औद्योगिकीकरण के दौरान संरक्षणवाद और शुल्कों से मज़बूती मिली।
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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्वीकरण और GATT जैसी व्यवस्थाओं से यह कमजोर पड़ा।
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21वीं सदी में वैश्वीकरण के विरोध, आर्थिक संकट और भू-राजनीतिक तनावों से पुनः उभार।
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स्थानीय उद्योगों की रक्षा के लिए टैरिफ, विदेशी निवेश नियंत्रण और सरकारी पूंजीवाद पर ज़ोर।
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लाभ: घरेलू उद्योगों की सुरक्षा, रोज़गार और राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा।
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आलोचनाएँ: व्यापार युद्ध, अक्षमता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर असर।
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भारत में नेहरू के आत्मनिर्भर मॉडल से लेकर “आत्मनिर्भर भारत” तक विकास।
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1991 के बाद सुधारों से उदारीकरण और संरक्षण का संतुलन।
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चुनौतियाँ: वैश्विक एकीकरण, असमानता घटाना और नई निर्भरता से बचना।





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