एंग्लो बर्मी युद्ध एक महत्वपूर्ण औपनिवेशिक संघर्ष था, जिसके परिणामस्वरूप बर्मा पर ब्रिटिश कब्जा हुआ और दक्षिण पूर्व एशिया की शक्ति संरचना बदल गई।
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- एंग्लो बर्मी युद्ध 1824 से 1885 के बीच ब्रिटिश साम्राज्य और बर्मा के शक्तिशाली कोनबौंग वंश के बीच लड़े गए महत्वपूर्ण संघर्ष थे।
- बर्मा के असम, मणिपुर और अराकान में तेजी से विस्तार ने ब्रिटिश भारत के साथ सीधा टकराव पैदा किया, जिससे तनाव बढ़ा और युद्ध की स्थिति बनी।
- प्रथम एंग्लो बर्मी युद्ध 1824 से 1826 के बीच हुआ और यांडाबो संधि के साथ समाप्त हुआ, जिसमें बर्मा को महत्वपूर्ण क्षेत्र छोड़ने पड़े।
- द्वितीय एंग्लो बर्मी युद्ध 1852 में ब्रिटिश व्यापारिक हितों के कारण हुआ, जिसके परिणामस्वरूप निचले बर्मा और पेगू क्षेत्र पर ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित हुआ।
- तृतीय एंग्लो बर्मी युद्ध 1885 में हुआ, जिसमें राजा थिबॉ को हटाकर 1886 तक पूरे बर्मा को ब्रिटिश शासन में मिला लिया गया।
- ब्रिटिश शासन के दौरान बर्मा के प्राकृतिक संसाधनों जैसे लकड़ी और व्यापार मार्गों का बड़े पैमाने पर दोहन किया गया, जिससे औपनिवेशिक हित मजबूत हुए।
- इन युद्धों के बाद व्यापक विरोध और विद्रोह हुए, जिससे राष्ट्रीय आंदोलन का उदय हुआ और स्वतंत्रता की मांग मजबूत हुई।
- 1935 में बर्मा को भारत से अलग किया गया और लंबे संघर्ष के बाद 4 जनवरी 1948 को स्वतंत्रता प्राप्त कर औपनिवेशिक शासन का अंत हुआ।





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