पूर्ण बजट और लेखानुदान भारत सरकार की महत्वपूर्ण वित्तीय व्यवस्थाएं हैं, जिनके माध्यम से सरकारी खर्च और संसदीय स्वीकृति सुनिश्चित की जाती है।
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- पूर्ण बजट में पूरे वित्तीय वर्ष के लिए सरकारी व्यय, राजस्व, कर प्रस्ताव और आर्थिक योजनाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया जाता है।
- लेखानुदान एक अस्थायी संसदीय स्वीकृति है, जिसके माध्यम से पूर्ण बजट पारित होने तक सरकार सीमित अवधि के लिए खर्च कर सकती है।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266 और अनुच्छेद 114 के अनुसार भारत की संचित निधि से धन निकालने के लिए संसद की अनुमति आवश्यक होती है।
- पूर्ण बजट की वैधता पूरे 12 महीने के वित्तीय वर्ष तक रहती है, जबकि लेखानुदान सामान्यतः 2 महीने के लिए मान्य होता है।
- लेखानुदान केवल सरकारी व्यय से संबंधित होता है, जबकि पूर्ण बजट में व्यय और राजस्व दोनों का विवरण शामिल होता है।
- लेखानुदान सामान्यतः लोकसभा में बिना विस्तृत चर्चा के पारित हो जाता है, जबकि पूर्ण बजट पर विस्तृत बहस और मतदान होता है।
- चुनावी वर्षों में सरकारें बड़े नीतिगत निर्णयों से बचने के लिए अंतरिम बजट और लेखानुदान प्रस्तुत करती हैं।
- लेखानुदान के माध्यम से नए कर लागू नहीं किए जा सकते और न ही प्रत्यक्ष करों में बदलाव संभव होता है क्योंकि इसके लिए वित्त विधेयक आवश्यक होता है।





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