Dadabhai Naoroji द्वारा प्रस्तुत ड्रेन ऑफ वेल्थ थ्योरी बताती है कि कैसे ब्रिटिश शासन ने भारत की संपत्ति को व्यवस्थित रूप से इंग्लैंड में स्थानांतरित किया, जिससे गरीबी और आर्थिक पिछड़ापन बढ़ा।
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- यह सिद्धांत 1867 में प्रस्तुत किया गया, जिसमें बताया गया कि ब्रिटिश नीतियों के कारण भारत की संपत्ति और संसाधन बिना उचित प्रतिफल के इंग्लैंड भेजे गए।
- इसके अनुसार भारत से कच्चा माल सस्ते में निर्यात किया जाता था, जबकि तैयार माल महंगे दामों पर आयात किया जाता था, जिससे असंतुलित व्यापार व्यवस्था बनी।
- ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन, पेंशन और लाभ के रूप में बड़ी राशि इंग्लैंड भेजी जाती थी, जिससे भारत में पूंजी निर्माण बाधित हुआ।
- “होम चार्जेस” जैसे प्रशासनिक खर्च, ऋण भुगतान और शासन लागत भारतीय राजस्व से चुकाए जाते थे, जिससे आर्थिक दबाव और बढ़ गया।
- किसानों और जमींदारों पर भारी कर लगाए गए, जिससे एकत्रित धन का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन भेज दिया गया और स्थानीय विकास प्रभावित हुआ।
- रेलवे, बागान और उद्योगों में ब्रिटिश निवेश से होने वाला लाभ भी इंग्लैंड भेजा जाता था, जिससे भारत में औद्योगिक विकास सीमित रहा।
- इस निरंतर धन निकासी के कारण गरीबी, अकाल और पारंपरिक उद्योगों का पतन हुआ, जिससे बेरोजगारी और आर्थिक पिछड़ापन बढ़ा।
- यह सिद्धांत भारतीय राष्ट्रवाद को मजबूत करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ और स्वशासन तथा स्वतंत्रता की मांग को आर्थिक आधार प्रदान किया।





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