भारत की एथेनॉल रणनीति ऊर्जा आत्मनिर्भरता, ग्रामीण आय और उत्सर्जन में कमी को बढ़ावा दे रही है, लेकिन खाद्य सुरक्षा, जल संकट और ढांचागत समस्याएं बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
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- भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग 2013 के 1.5 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में लगभग 18 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो ऊर्जा नीति में बड़े बदलाव को दर्शाता है।
- यह रणनीति कच्चे तेल के आयात को कम करने पर केंद्रित है, जो भारत की कुल ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा है।
- एथेनॉल ब्लेंडिंग से हर साल ₹30,000 करोड़ से अधिक विदेशी मुद्रा की बचत और लगभग 10 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन में कमी का अनुमान है।
- इस कार्यक्रम ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ₹90,000 करोड़ से अधिक का प्रवाह किया है, जिससे किसानों और चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है।
- दूसरी पीढ़ी के एथेनॉल उत्पादन में कृषि अपशिष्ट का उपयोग होता है, जिससे पराली जलाने की समस्या कम होती है और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा मिलता है।
- हालांकि, एथेनॉल के लिए कच्चे माल की बढ़ती मांग खाद्य फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा पैदा कर रही है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
- गन्ने जैसी पानी अधिक खपत वाली फसलों पर निर्भरता भूजल स्तर पर दबाव बढ़ा रही है, खासकर जल संकट वाले राज्यों में।
- बुनियादी ढांचे की कमी, लॉजिस्टिक समस्याएं और तकनीकी चुनौतियां भारत की एथेनॉल रणनीति के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बनी हुई हैं।





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