ब्रिटिश भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में उभरे, जिनका उद्देश्य समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे जाति भेदभाव, अस्पृश्यता, लैंगिक असमानता, बाल विवाह और अंधविश्वास को समाप्त करना था। पश्चिमी शिक्षा, उदारवादी विचारों और बढ़ती राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित होकर भारतीय सुधारकों ने शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और धार्मिक व्याख्याओं के माध्यम से समाज को आधुनिक बनाने का प्रयास किया।
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- सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश भारत में शुरू हुए।
- उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों जैसे जाति भेदभाव, अस्पृश्यता और बाल विवाह को समाप्त करना।
- सुधारकों ने पश्चिमी विचारों और भारतीय परंपराओं का संतुलित समन्वय किया।
- ब्रिटिश शासन के दौरान सामाजिक कमजोरियाँ अधिक स्पष्ट हुईं।
- यूरोपीय प्रबोधन के विचार—तर्कवाद, उदारवाद और मानवतावाद—का प्रभाव पड़ा।
- ईसाई मिशनरियों ने पश्चिमी शिक्षा और सामाजिक सुधार के विचार फैलाए।
- प्रिंटिंग प्रेस, समाचार पत्र और शिक्षण संस्थानों से सुधारवादी विचार तेजी से फैले।
- पश्चिमी शिक्षा प्राप्त नया मध्यवर्ग सुधार आंदोलनों का समर्थक बना।
- शिक्षा, सामाजिक अभियान और कानूनों के माध्यम से परिवर्तन लाने की कोशिश।
- इन आंदोलनों ने आधुनिक भारतीय समाज और राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।





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